जया किशोरी के घूंघट बयान पर इतिहास की पड़ताल।

कथावाचक जया किशोरी ने अपने एक संबोधन में कहा कि घूंघट प्रथा प्राचीन भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं थी। उनका तर्क था कि अगर ऐसा होता, तो मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियां भी घूंघट में दिखाई देतीं। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रथा विदेशी आक्रमणों के समय समाज में आई और बाद में परंपरा बन गई।
IndiaHap के अनुसार, सिर्फ मंदिरों की मूर्तियों को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि घूंघट प्रथा थी या नहीं।
असल में, ancient temple murtis Shilpa Shastra और Agama Shastra के अनुसार बनाई जाती थीं। उनका उद्देश्य spirituality दिखाना था, न कि उस समय के लोगों का daily lifestyle या social customs.
इसलिए किसी देवी की मूर्ति में घूंघट नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि Hindu society में कभी head covering या veil की परंपरा नहीं थी।
Temple idols religious rules के अनुसार बनती हैं, जबकि ghunghat एक social custom है। दोनों की तुलना सीधे करना historical evidence नहीं माना जा सकता।
Maurya, Kushan और Gupta period की ज्यादातर मूर्तियां भी धार्मिक शास्त्रों के अनुसार बनी थीं। उस समय artists ने देवी-देवताओं को symbolic form में दिखाया, न कि आम लोगों की तरह।
कई historians मानते हैं कि medieval period में विदेशी आक्रमणों के बाद North India के कई क्षेत्रों में purdah और ghunghat ज्यादा प्रचलित हुए। लेकिन यह कहना कि घूंघट पूरी तरह उसी समय शुरू हुआ, इस पर इतिहासकारों की एक राय नहीं है।
Jaya Kishori का मुद्दा चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन सिर्फ यह कहना कि "मूर्तियों में घूंघट नहीं है, इसलिए Hindu culture में घूंघट कभी था ही नहीं", historical proof नहीं माना जा सकता।
History को समझने के लिए archaeology, scriptures, literature और historical research सभी को साथ में देखना जरूरी है।
IndiaHap का मानना है कि ऐसे विषयों पर निष्कर्ष भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और इतिहास के आधार पर निकाला जाना चाहिए.
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